छत्तीसगढ़

नैसर्गिक अर्जुना वृक्षों पर कोसा उत्पादन में वृद्धि सुनिश्चित की जायेगी: सुधाकर खलको

ग्रामोद्योग विभाग के अंतर्गत कोसा संग्रहण एवं कोसा वस्त्र निर्माण से लोगो को अतिरिक्त रोजगार प्राप्त होता है

रायपुर: ग्रामोद्योग विभाग के अंतर्गत कोसा संग्रहण एवं कोसा वस्त्र निर्माण से लोगो को अतिरिक्त रोजगार प्राप्त होता है । भारत के कोसा उत्पादन में छत्तीसगढ़ का दूसरा स्थान है । इन कोसा फलों से रूपये 300 करोड़ के कोसा वस्त्र प्रति वर्ष बनाये जाते हैं । छत्तीसगढ़ के कोसा वस्त्रों की मांग देश के साथ विदेशों में भी है। यह जानकारी छत्तीसगढ़ ग्रामोद्योग विभाग के संचालक श्री सुधाकर खलको आई.ए.एस. ने अपने पाटन प्रवास पर दी ।

सुधाकर खलको ने यह भी अवगत कराया कि छत्तीसगढ़ में दो प्रकार का कोसा उत्पादन होता है। पहला अण्ड़े लेकर कृषक वनखंडों पर कीड़ा पालन कर कोसा उत्पादन करते हैं जो साजा, अर्जुना आदि के पौधों पर होते हैं। इन कोसा फलों को विभाग द्वारा शासकीय समर्थन मूल्य पर क्रय कर बुनकरों को वस्त्र बनाने हेतु प्रदान किया जाता है। कोसा का दूसरा प्रकार नैसर्गिक कोसा का उत्पादन होता है । ये कोसा के कृमि खाद्य वृक्षों जैसे- बस्तर में साल, अन्य क्षेत्रों में साजा, अर्जुना, सेन्हा आदि वृक्षों पर मानव अवरोध के बिना पत्ती खाकर कोसा बनाते हैं । नैसर्गिक कोसा का मूल्य अपेक्षाकृत अधिक होता है क्योंकि उनमें धागा अधिक होता है एवं धागे की निरंतरता बनी रहती है। अतः विभाग दोनों प्रकार के कोसा उत्पादन को बढ़ा रहा है।

पाटन क्षेत्र में आश्चर्यजनक रूप से अर्जुना वृक्षों की संख्या 4लाख 36 हजार है। चूंकि ये बड़े -बड़े वृक्ष है अतः इसमें कोसा पालन करने के बजाय नैसर्गिक रूप से कोसा उत्पादन हेतु अनुकूल हैं। क्षेत्र में वृक्षों की संख्या को देखते हुए विपुल मात्रा में नैसर्गिक कोसा उत्पादन की संभावनाएं है। पाटन क्षेत्र में विशेष ध्यान देकर नैसर्गिक कोसा उत्पादन को बढ़ाने के लिए कार्ययोजना पर कार्यवाही प्रगति पर है।

सुधाकर खलको संचालक ग्रामोद्योग ने अपने पाटन क्षेत्र के प्रवास के दौरान कई ग्रामों एवं खेतों के अर्जुना वृक्षों पर छोड़े गये कोसा कृमियों को देखा। उनमें से कई कृमि कोसा बना रहे थे एवं शेष कृमि वृक्षों में अर्जुन की पत्तियां खाकर परिपक्व हो रहे थे। उन्होंने क्षेत्र के पंचायत प्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों से भी मुलाकात की। ग्राम पंचायत मानिकचैरी की सरपंच श्रीमती पूर्णिमा नेताम के साथ स्थल निरीक्षण भी किया। सरपंच ने मांग की कि क्षेत्र के समस्त अर्जुना वृक्षों का दोहन किया जावे ताकि क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा कोसा उत्पादन एवं संग्रहण हो सके। संचालक ने उन्हें आश्वस्त किया कि हम प्राथमिकता के आधार पर पाटन क्षेत्र में यह काम कर रहे हैं । यदि ग्रामीण महिलाएं उन कोसा फलों से धागा निकालने का काम घर में करना चाहे तो हम उन्हें धागा निकालने की मशीन भी प्रदान करेंगे।

सुधाकर खलको संचालक ग्रामोद्योग ने अवगत कराया कि विभाग द्वारा 10 कैम्पों के मार्फत लगभग 01 लाख अर्जुना वृक्षों में 02 करोड़ 75 लाख कोसा के कृमि अब तक छोड़े जा चुके हैं जो वृक्षों में छोटी अवस्था से लेकर कोसा बनाने तक की अवस्था में हैं। विभाग के अधिकारियों से चर्चा एवं विभिन्न ग्रामों के प्रक्षेत्र निरीक्षण से इस वर्ष विपुल मात्रा में कोसा उत्पादन एवं संग्रहण की संभावनाएं है। निश्चित तौर पर इन कोसा फलों से चांपा, रायगढ़ एवं कोरबा में वस्त्र निर्माण में आशातीत वृध्दि होगी एवं कोसा वस्त्रों का पूर्व वर्षो की तुलना में अधिक निर्यात होगा। सुधाकर खलको संचालक ग्रामोद्योग के साथ डाॅं. राजेश बघेल अपर संचालक भी उपस्थित रहे।

प्रश्न- ग्रामोद्योग विभाग के मार्फत आपकी प्राथमिकता क्या है ?
उत्तर- विभाग के मार्फत ग्राम स्तरीय कार्ययोजना बनाकर अधिकतम लक्ष्य रखा जायेगा जिससे कोसा संग्रहण का काम, बुनकरों एवं शिल्पियों के द्वारा कच्चा उत्पाद अधिकतम करवाकर उसकी मूल्याभिवृध्दि कर अधिकतम रोजगार देना है।

प्रश्न- क्या पाटन क्षेत्र में ही अधिकतम अर्जुना के वृक्ष है ?
उत्तर- क्षेत्रफल के हिसाब से पाटन क्षेत्र में आश्यर्चजनक अधिकतम अर्जुना वृक्ष हैं। वैसे अन्य जिलों मे भी विशेषतः पाटन से सटे धमतरी जिले के कुरूद एवं मगरलोड एवं धमतरी मे भी अर्जुना के वृक्ष हैं। जहां नैसर्गिक कोसा उत्पादन में वृध्दि हेतु कार्यक्रम जारी है।

प्रश्न- एक कोसा बनाने हेतु एक कोसा कृमि को कितने पत्ती की आवश्यकता होती है एवं पाटन क्षेत्र के अर्जुना वृक्षों से कितना कोसा उत्पादन हो सकता है ?
उत्तर- एक कोसा कृमि को प्रारंभ से लेकर कोसा बनाते तक 300 ग्राम अर्जुन पत्ती की आहार के रूप में आवश्यकता होती है। पाटन क्षेत्र के समस्त अर्जुना वृक्षों से लगभग 05 करोड़ नग कोसा उत्पादन की संभावना है।

प्रश्न- कोसा कृमि जो वृक्षों पर छोड़े जा रहे हैं क्या उसके लिए पर्याप्त कोसा अण्ड़ा उपलब्ध है ?
उत्तर- हां । कार्ययोजना अनुसार विभाग के निजी बीज उत्पादनकर्ता एवं केन्द्रीय रेशम बोर्ड (भारत सरकार) से इसकी समुचित आपूर्ति हो सकती है।

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