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सफलता की कहानी: सिंचाई की सुविधा पाकर नई उर्जा से उत्साहित हैं पाराडोल के गोंदा सिंह

बैकुण्ठपुर: विकासखण्ड मुख्यालय मनेन्द्रगढ़ से लगभग आठ किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत पाराडोल जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर से लगभग 64 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। गांव का क्षेत्रफल लगभग 359 एकड़ है। 2839 जनसंख्या वाले इस गांव में महात्मा गांधी नरेगा के जाॅब कार्डधारी परिवारों की संख्या 705 है। इस गांव में वनवासियों की संख्या ही बहुतायत में है। अनुसूचित जनजाति वर्ग के रहवासियों के बीच महात्मा गांधी नरेगा के कार्य करने वाले श्रमिकों के साथ शहरी क्षेत्र में जाकर रोजगार करने वाले गांव में सिंचाई के सीमित साधन ही हैं। एक ओर का क्षेत्र सिंचित है परंतु उससे गांव की एक चैथाई से भी कम भूमि सिंचित होती है। ज्यादातर आर्थिक रूप से संबल किसानेां ने अपने लिए बोर के माध्यम से सिंचाई के साधन और पेयजल की व्यवस्था बनाई है। इसी गांव में रहने वाले गोंदा सिंह को पंचायत की ग्राम सभा में तकनीकी सहायक सुश्री साइना बी ने बताया कि कुंए का निर्माण कराने से उनके पेयजल और खेतों को सिंचाई का वैकल्पिक साधन मिल जाएगा। तब उन्होने जीपीडीपी निर्माण के समय अपनी मांग दर्ज कराकर आवेदन पत्र ग्राम पंचायत को दिया।

पाराडोल में निवासरत गोंदा सिंह के परिवार में एक पुत्र और पत्नी हैं। मात्र 96 डिसमिल जमीन के मालिक गोंदा सिंह के पास बारिश के अलावा कोई अन्य साधन नहीं था कि वह अपने मेहनत से कुछ आगे कर पाते। दसवीं तक पढ़ चुके पुत्र को भी कोई काम न होने के कारण दूसरे के खेतेां में काम करने के लिए भेजना या फिर महात्मा गांधी नरेगा के कार्यों में रोजगार की तलाश ही उनकी आजीविका का साधन था। ऐसे में वह लंबे समय से अपने भूमि में सिंचाई और पेयजल के एक स्रोत के लिए परेशान थे। कूप निर्माण को लेकर किसानों के बीच एक उहापोह की स्थिति सदैव रहती है क्योंकि पाराडोल एक पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण थोड़ी सी खुदाई करने से ही चटटाने आ जाती हैं और वहां पर काम रूक जाता है। वहीं उंचे भूमि में कूप निर्माण में पानी की उपलब्धता काफी कम हो जाती है। ऐसे में कूप निर्माण के लिए सही जगह का चयन भी गोंदा सिंह के लिए एक चुनौती की तरह ही था। तकनीकी सहायक की मदद से उन्होने सही जगह का चयन किया जहां उन्हे प्रारंभिक स्तर पर ही पर्याप्त जलस्रोत मिल गया।

जीपीडीपी में ग्राम पंचायत के प्रस्ताव के आधार पर जनपद पंचायत की अनुसंशा उपरांत जिला पंचायत कोरिया द्वारा हितग्राही गोंदा सिंह को कूप निर्माण कराए जाने की अनुमति प्रदान की गई। प्रशासकीय स्वीकृति प्राप्त होते ही ग्राम पंचायत ने 24 जनवरी 2019 को गोंदा सिंह के खेत में उनके बताए गए स्थान पर कूप निर्माण का काम प्रारंभ किया। इसके लिए सबसे पहले तकनीकी सहायक सुश्री साइना बी ने रोजगार सहायक की उपस्थिति में 5 मीटर व्यास का ले-आउट दिया। इसके बाद 12 श्रमिकों के नियोजन के साथ मिट्टी खुदाई का काम प्रारंभ हुआ। इसमें श्री भागारथी ने 24 दिनों का काम किया। और उसके परिवार से पत्नी और बेटे ने भी महात्मा गांधी नरेगा के तहत अकुशल श्रम करते हुए रोजगार मूल्य प्राप्त किया। जनपद पंचायत मनेन्द्रगढ के देखरेख में ग्राम पंचायत पाराडोल ने बतौर क्रियान्वयन एजेंसी गोंदा सिंह का कूप निर्माण का काम करवाया।

इस कूप के निर्माण में ग्राम पंचायत की तकनीकी सहायक सुश्री साइना बी की काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन्होंने ग्राम सभा में कूप निर्माण के फायदे से अवगत कराया जिससे प्रभावित होकर गोंदा सिंह ने जीपीडीपी बनाने के लिए आए दल के सामने अपने कूप निर्माण के लिए आवेदन किया। तकनीकी सहायक साइना ने अपने पूरे देखरेख में इस कूप का निर्माण काफी सफलता से कराया। अब गोंदा सिंह को अपने पैरों पर खडे होने का उत्साह मिलने के पीछे इनकी ही मुख्य मेहनत रही है।

कुछ माह पूर्व ही अंतिम रूप से यह कूप निर्माण कार्य पूर्ण हुआ है। इसके प्रारंभिक चरण में ही गोंदा सिंह को इसका सीधा लाभ मिलना शुरू हो गया था। गोंदा सिंह के पास अधिकृत रूप से लगभग एक एकड़ की कृषि भूमि है जिसके साथ लगी लगभग एक एकड़ वनाधिकार की भूमि को भी वह जोतकर धान की खेती करते हैं। पहले उनकी खेती का आधार सिर्फ बारिश हुआ करती थी। पाराडोल क्षेत्र में औसतन 1000 मिलीमीटर पानी गिरता है परंतु धान का थरहा करने के बाद अक्सर उनको समय पर पानी न गिरने से थरहा सूखने की समस्या से दो-चार होना पड़ता था। कई बार उनके मंहगे बीज पानी की कमी से रोपा के लिए तैयार नहीं होते थे साथ ही कई बार पानी की कमी से वह समय पर रोपा भी नहीं लगा पाते थे। ऐसे में इस बार जब उन्होने हाइब्रिड धान की 12 किलो बीज का थरहा लगाया तो कूप के निर्माणाधीन रहने के साथ ही उन्हे थरहा की सिंचाई का दोहरा लाभ मिला। उसका परिणाम यह रहा कि एक एकड़ में जहां 10 क्विंटल धान के लिए भी गोंदा सिंह के परिवार को जददोजहद करनी पड़ती थी वहीं इस बार उनको 30 क्विंटल धान की बंपर फसल मिली है। कूप निर्माण के बाद गोंदा सिंह ने पहली बार आलू के साथ अन्य मौसमी सब्जी लगाई, जिससे उन्हें आर्थिक लाभ होगा। उन्होंने धान की फसल से 30 क्विंटल धान से ज्यादा की पैदावार हुई। साल भर खाने के अलावा इसको बेचने से उन्हे लगभग 50 हजार रूपए का लाभ मिलना है। इसके बाद रबी की फसल के रुप में इन्होने गेंहू और आलू के साथ टमाटर और गोभी की फसल भी लगाई है।

कार्य संबंधी आकर्षक आंकड़े

  • प्रशासकीय स्वीकृति राशि 1 लाख 80 हजार रूपए
  • व्यय राशि 67 हजार 44 रूपए, मटेरियल भुगतान शेष
  • कार्य में नियोजित श्रमिकों की संख्या 76
  • सृजित मानव दिवस 425
  • गोंदा सिंह के परिवार को प्राप्त रोजगार दिवसों की संख्या 76 दिन
  • गोंदा सिंह के परिवार को प्राप्त मजदूरी राशि 13 हजार 260 रूपए

गोंदा सिंह के लिए जंहा पानी एक समस्या के रूप में थी और वह मेहनती होकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे वहां उनके लिए महात्मा गांधी नरेगा का कुंआ निर्माण नया उत्साह लेकर आया है। मात्र एक खरीफ की फसल से ही उनकी आर्थिक मजबूती शुरू हो चुकी है। उन्होने मनरेगा से मिले अपने कुंए के निर्माण में मिले अकुशल श्रम से ही मिली राशि से 6 हजार रूपए का पंप ले लिया है। बिजली की सुविधा से चलने वाले इस पंप से अब वह अपने खेतो में आलू के साथ अन्य सब्जियों के उत्पादन में जुट गए है। पहले जहां धान की खेती के बाद रोजगार उनके लिए एक चुनौती थी वहीं अब वह अपने बेटे के साथ अपने सब्जी भाजी के उत्पादन में जुटे हुए हैं।

हितग्राही गोंदा सिंह कहते हैं सब कुछ रहिस पर पानी नई रहिस। इंजीनियर मेडम हर बताइस त मनरेगा के कुंआ बर आवेदन कर देहें। सब झन मिल के बनाए डारेन। पैसा भी मिलिस त पंप ल लाने हंव ओकर से धान-पान भी नगदे होइस। पहिली धार खेत मन में गेंहू लगावत हौं और आलू संग साग-भाजी भी लगा लेहें। एक दू साल खेती नगद हो जाही त बेटवा के बिआह कर देहूं। फेर कोई चिंता नई है।

मुख्यकार्यपालन अधिकारी तूलिका प्रजापति ने कहा कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना अंतर्गत आजीविका से संबंधित कार्य कराए जाने के तहत गोंदा सिंह को कूप निर्माण कार्य स्वीकृत किया गया। इसमें हितग्राही द्वारा स्वयं एवं उनके परिवार द्वारा कार्य करके आर्थिक लाभ प्राप्त किया गया साथ ही अब हितग्राही का कुंआ बनकर तैयार है जिसका प्रत्यक्ष लाभ दिखने लगा है। इस तरह के अनेक कार्यों से ग्रामीण परिवारों की आजीविका को स्थायित्व देते हुए रोजगार के साथ मजबूत किया जा रहा है।

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