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जानिए आवळा नवमी के बारे में: पण्डित मनोज शुक्ला

दीपावली के बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी (आंवला वृक्ष की पूजा परिक्रमा), आरोग्य नवमी, अक्षय नवमी, कूष्मांड नवमी के नाम से जाना जाता है

रायपुर: दीपावली के बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी (आंवला वृक्ष की पूजा परिक्रमा), आरोग्य नवमी, अक्षय नवमी, कूष्मांड नवमी के नाम से जाना जाता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार यह पर्व मंगलवार यानि 5 नवम्बर मंगलवार को है। अक्षय नवमी के अवसर पर आंवले के पेड़ की पूजा करने का विधान है। इस दिन सुबह नहाने के पानी में आंवले का रस या पावडर मिलाकर नहाना चाहिए, ऐसा करने से आपके ईर्द-गिर्द जितनी भी नेगेटिव ऊर्जा होगी वह समाप्त हो जाती है। सकारात्मकता और पवित्रता में बढ़ौतरी होती है। फिर आंवले के पेड़ और देवी लक्ष्मी का पूजन करना चाहिए। कार्तिक शुक्ल नवमी को आंवले की पूजा कर ब्रह्मणों को भोजन करा स्वयं भी परिवार सहित आवळा पेड के छांव में भोजन करने का विशेष महत्व माना गया है।

मान्यता है कि कार्तिक मास की नवमी को आंवला के पेड़ के नीचे अमृत की वर्षा होती है। चरक संहिता में बताया गया है अक्षय नवमी को महर्षि च्यवन ने आंवला खाया था जिस से उन्हें पुन: यौवन अर्थात नवयौवन प्राप्त हुआ था। कोई भी इस दिन यह उपाय करके नवयौवन प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्र कहते हैं आंवले का रस हर रोज पीने से पुण्यों में बढ़ोतरी होती है और पाप नष्ट होते हैं।

कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि में आंवले की पूजा को पुत्र प्राप्ति के लिए भी विशेष लाभदायक माना गया है।

व्रत की पूजा का विधान:

* आवळा नवमी के दिन महिलाएं सुबह से ही स्नान ध्यान कर आंवला के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में मुंह करके बैठती हैं।
* इसके बाद वृक्ष की जड़ों को दूध से सींच कर उसके तने पर कच्चे सूत का धागा लपेटा जाता है।
* तत्पश्चात रोली, चावल, धूप दीप से वृक्ष की पूजा की जाती है।
* आंवले के वृक्ष की परिक्रमा करके ब्राह्मणों, भाई बंधू व परिवार जनो के साथ वहीं पर भोजन करें।

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