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महाविजय के 50 साल: भारतीय सेना ने पाक को कैसे चटाई धूल… पूरी कहानी एक क्लिक में..

नई दिल्ली: 16 दिसंबर यानी वह तारीख जब 49 साल पहले दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश के रूप में एक नए देश का जन्म हुआ और पाकिस्तान का नक्शा बदल गया था। यह वह तारीख है, जिस दिन पाकिस्तान को लगभग आधा देश गंवाने के बाद भारतीय सेना के आगे घुटने टेकने पड़े थे।

युद्ध की असल वजह क्या थी?

पश्चिमी पाकिस्तान की दमनकारी नीतियों के कारण पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष बढ़ता जा रहा था। शेख मुजीबुर्रहमान पूर्वी पाकिस्तान को आज़ाद कराने के लिए शुरू से ही संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने इसके लिए एक 6 सूत्रीय फॉर्म्यूला तैयार किया था। इसकी वजह से उनपर पाकिस्तानी सरकार ने मुकदमा तक चलाया। साल 1970 का पाकिस्तान चुनाव पूर्वी पाकिस्तान को आज़ाद देश बनाने में अहम रहा। मुजीबुर्रहमान की पार्टी पूर्वी पाकिस्तानी आवामी लीग को जीत मिली थी। पूर्वी पाकिस्तान की 169 से 167 सीटें शेख मुजीब की पार्टी को मिली लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं को यह स्वीकार नहीं हुआ और उन्हें जेल में डाल दिया गया।

देश की सत्ता में उचित प्रतिनिधित्व न मिलने की वजह से पूर्वी पाकिस्तान में विरोध की आवाज़ें और बुलंद हो गई। जनता सड़कों पर आंदोलन करने लगी। इस आंदोलन को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने कई क्रूर अभियान चलाए। हत्या और बलात्कारों के मामले दिनोंदिन बढ़ते रहे। इन अत्याचरों से बचने के लिए बड़ी संख्या में लोग भारत में शरण लेने लगे, जिससे भारत में शरणार्थी संकट बढ़ने लगा।

भारत ने किया मुक्तवाहिनी की मदद का निर्णय 

इन सब अत्याचारों और शरणार्थियों की बढ़ती संख्या को लेकर भारत सतर्क था। 31 मार्च, 1971 को भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बंगाल के लोगों को मदद देने की बात कही। पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचारों से निपटने के लिए पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी सेना बनी, जिसे भारतीय सेना ने पूरी तरह मदद मुहैया कराई थी।

नाराज़ पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन चंगेज़ खान’ के नाम से भारत के 11 एयरेबसों पर हमला कर दिया। इस हमले के बाद ही 3 दिसंबर को भारत आधिकारिक तौर पर युद्ध का हिस्सा बना। यह युद्ध 13 दिनों यानी 16 दिसंबर तक चला। इसी दिन बांग्लादेश आज़ाद हुआ। इसके बाद से भारत में यह दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

नौसेना ने कराची पोर्ट पर बोला था हमला

सन 1971 में 4-5 दिसंबर की रात को भारतीय नौसेना ने ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ को अंजाम दिया। उस समय अर्थव्यवस्था की दृष्टि से पाकिस्तान के लिए कराची बंदरगाह बहुत अहम था। दिल्ली स्थित भारतीय नौसेना के हेडक्वार्टर और वेस्टर्न नेवल कमांड ने मिलकर ऑपरेशन को अंजाम देने की योजना बनाई। इस ऑपरेशन का मकसद कराची में पाकिस्तानी नौसेना के अड्डे पर हमला बोलना था। भारतीय नौसेना के हमले में  पाकिस्तान के 4 पोत डूब गए थे और 500 से ज्यादा पाकिस्तानी नौसैनिक मारे गए थे।

हमले में कराची हार्बर फ्यूल स्टोरेज को भी पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया था। इस ऑपरेशन में पहली बार एंटी-शिप मिसाइल का इस्तेमाल किया गया था। इस हमले के बाद ही 8-9 दिसंबर 1971 को भारतीय नौसेना ने ‘ऑपरेशन पाइथन’ चलाया। इस दौरान भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाहों पर मौजूद जहाजों पर हमला किया था। इस दौरान एक भी भारतीय जहाज को नुकसान नहीं पहुंचा था। इस ऑपरेशन की सफलता के बाद से ही हर साल 4 दिसंबर को भारत में नेवी डे के रूप में मनाया जाने लगा।

भारतीय सेना ने दिया मुंहतोड़ जवाब

पाकिस्तानी कार्रवाई के जवाब में भारत ने उसके 15 हजार किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। यह युद्ध तब खत्म हुआ जब पाकिस्तानी सशस्त्र बल के तत्कालीन प्रमुख जनरल आमिर अब्दुल्लाह खान नियाज़ी ने अपने 93 हज़ार सैनिकों के साथ भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

हालांकि, भारत ने पाकिस्तान के साथ सन् 1972 में शिमला समझौता किया। इस समझौते के तहत भारत ने पश्चिमी मोर्चे पर जीती जमीन भी लौटा दी और पाकिस्तानी युद्धबंदियों को भी छोड़ दिया। बांग्लादेश को पाकिस्तान के चंगुल से आजाद करा दिया और उसकी जमीन से भारतीय सेना वापस लौट आई।

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